सुना था 'मानवता' अभी मरी नहीं है. आज भी हमारे देश में बहुत से इसे लोग हैं जो बिना किसी स्वार्थ क दूसरों की सहायता क लिए सदेव तत्पर रहते हैं. फिर यह निस्वार्थ सहायता चाहे किसी भी रूप में क्यों न हो.
एक महिला की छोटी सी हिम्मत ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था और सोचने को मजबूर कर दिया की हम सभी कहते तो हैं हमें जरुरतमंदो की सहायता करनी चाहिए, गलत बात के लिए सदेव विरोध करना चाहिए पर हम में से कितने लोग सच में एसा कर पाते हैं? आए दिन हम अपने आस-पास महिलाओं, बच्चों के साथ छेडकानी, बदतमीजी देखकर नज़र-अंदाज़ कर देते हैं क्योंकि वो हमारे कुछ लगते जो नहीं हैं.
मुझे आज भी याद है २ साल पहले क़ा वह दिन, मेन ऑफिस से बस में सफ़र कर रही थी, शाम का वक्त था, ऑफिस टाइम होने से बस में भीड़ बहुत थी। तभी दो लोफर लड़के हेल्पर /कंडक्टर से टिकिट को लेकर बहस करने लगे और इतने में एक ने उस हेल्पर जो बेचारा बच्चा ही था, को जोर से २-४ थप्पर जड़ दिए और गाली-गलोच करने लगा। सभी चुप-चाप मूक दर्शक बन कर देखते रहे और ऊन सभी में मैं भी शामिल थी क्योंकि मैं भी सभी की तरह यही सोच रही थी की कौन इस पचड़े में पड़ेगा एंड इन गुंडे लड़कों से पंगा क्यों ले भला। पर तभी एक युवा महिला जोर से बोली,'तुमने इसे थपर क्यों मारा, मुंह से भी तो बात कर सकते हो" वो आवारा लड़का गुस्से में बडबडाने लगा " तुझे क्या तकलीफ हो रही है "। पर फिर भी वह महिला नहीं डरी और बोली "तुम सब के सामने किसी को चांटा मार दोगे, कुछ भी करते रहोगे और तुम्हे कोई कुछ भी नहीं बोलेगा, क्या अब तुम्हे तमीज भी सिखानी पड़ेगी"। उस महिला की हिम्मत के सामने उन लड़कों की भी बोलती बंद हो गयी। थोड़ी देर बाद उस महिला का स्टॉप आ गया और वह ग़ेट पर लटके उन लड़कों को डट कर बोली "ग़ेट से हटो"। मैं ये देखकर दंग रह गयी की उस महिला को जरा डर नहीं लगा कहीं ये दोनों उसका पीछा या बद्तिमीजी तो नहीं करेंगे। उसकी हिम्मत और साहस देखकर मुझे भी अपने आप में आत्म-विश्वास आया है की हम अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों की मदद भी कर सकते हें और हमें करनी चाहिए।
एक महिला की छोटी सी हिम्मत ने मुझे अन्दर तक हिला दिया था और सोचने को मजबूर कर दिया की हम सभी कहते तो हैं हमें जरुरतमंदो की सहायता करनी चाहिए, गलत बात के लिए सदेव विरोध करना चाहिए पर हम में से कितने लोग सच में एसा कर पाते हैं? आए दिन हम अपने आस-पास महिलाओं, बच्चों के साथ छेडकानी, बदतमीजी देखकर नज़र-अंदाज़ कर देते हैं क्योंकि वो हमारे कुछ लगते जो नहीं हैं.
मुझे आज भी याद है २ साल पहले क़ा वह दिन, मेन ऑफिस से बस में सफ़र कर रही थी, शाम का वक्त था, ऑफिस टाइम होने से बस में भीड़ बहुत थी। तभी दो लोफर लड़के हेल्पर /कंडक्टर से टिकिट को लेकर बहस करने लगे और इतने में एक ने उस हेल्पर जो बेचारा बच्चा ही था, को जोर से २-४ थप्पर जड़ दिए और गाली-गलोच करने लगा। सभी चुप-चाप मूक दर्शक बन कर देखते रहे और ऊन सभी में मैं भी शामिल थी क्योंकि मैं भी सभी की तरह यही सोच रही थी की कौन इस पचड़े में पड़ेगा एंड इन गुंडे लड़कों से पंगा क्यों ले भला। पर तभी एक युवा महिला जोर से बोली,'तुमने इसे थपर क्यों मारा, मुंह से भी तो बात कर सकते हो" वो आवारा लड़का गुस्से में बडबडाने लगा " तुझे क्या तकलीफ हो रही है "। पर फिर भी वह महिला नहीं डरी और बोली "तुम सब के सामने किसी को चांटा मार दोगे, कुछ भी करते रहोगे और तुम्हे कोई कुछ भी नहीं बोलेगा, क्या अब तुम्हे तमीज भी सिखानी पड़ेगी"। उस महिला की हिम्मत के सामने उन लड़कों की भी बोलती बंद हो गयी। थोड़ी देर बाद उस महिला का स्टॉप आ गया और वह ग़ेट पर लटके उन लड़कों को डट कर बोली "ग़ेट से हटो"। मैं ये देखकर दंग रह गयी की उस महिला को जरा डर नहीं लगा कहीं ये दोनों उसका पीछा या बद्तिमीजी तो नहीं करेंगे। उसकी हिम्मत और साहस देखकर मुझे भी अपने आप में आत्म-विश्वास आया है की हम अपनी ही नहीं बल्कि दूसरों की मदद भी कर सकते हें और हमें करनी चाहिए।
मैं इस पोस्ट क माध्यम से उन सभी लोगों को भी अनुरोध करती हूँ जो अपना खाली टाइम सत्संग या धार्मिक स्थानो में बिताते हें, अगर वो अपना कुछ समय जरुरत मंद लोंगों की मदद करने में व्यतीत करें तो निश्चित रूप से उन्हें आत्मशांति की अनुभूति होगी। जो लोग नौकरी या बिसनेस आदि में हें वो भी कई तरीके से जरुरत मंदों की मदद कर इंसान होने का गौरव प्राप्त कर सकते हें। निस्स्वार्थ रूप से की गयी सहायता रुपये-पैसे से की जाने वाली सहायता से भी बड़ी होती है। जैसे:-
१) रक्त दान - महादान
२) नेत्रहीन /वृद्ध /विकलांग व्यक्ति की सहायता किसी भी प्रकार से करना जैसे रोड पार कराना या बस/ट्रेन आदि में सीट देना आदि ।
३) घायल को अस्पताल पहुचाना और उसके परिजनों को सूचित करना।
४) गरीब, निसहाय तथा वृद्ध जो अकेले अस्पतालों क चक्कर काटते रहते हैं जिन्हें अस्पताल के नियम औपचारिकता आदि नहीं पता , आप यहाँ कभी महीने /हफ्ते में एक दिन जाकर भी उन निसहाय लोगों की मदद कर सकते हैं।
५) गलत बात और गलत व्यक्ति का विरोध करें क्योंकि बुराई को सदेव हटाए, दबाएँ नहीं, नहीं तो वह और बढेगी।
६) और आखरी पर सबसे अहम, ये सभी उपरोक्त बातों पर अमल करें तथा अपने आस पास सभी लोगों और बच्चों को भी यही समझाएं की सेवा ही परम धरम है यही सही अर्थ में मानवता है।
सच अगर हम सच्चे मन से लोगों की निस्वार्थ सेवा करें तो उनकी दूआओं से हमारे जीवन में खुशियाँ ही खुशियाँ आ जाएँगी।