'वो' कोई और नहीं बल्कि उन्ही दोनों की बनाई गयी आपस की दूरी थी जिसने दोनों को एक दुसरे से इतना दूर कर दिया की बात तलाक तक पहुँच गयी।' वो' जिसका कोई वजूद ही नहीं था धीरे धीरे अहम्, शक, लड़ाई झगडा और फिर तलाक न जाने कितने रूप ले लेती है। ये थोड़ी सी दूरी पति-पत्नी क नाज़ुक रिश्ते को बिखरा कर रख देती है। साथ-साथ जीने मरने की कसमें खाने वाले राहुल और गरिमा को अब एक-एक पल साथ रहना मुश्किल लग रहा था। कैसे ये दोनों साथ रहकर भी जुदा जुदा सी सारी जिंदगी बिताएंगे। लव मर्रिज होने क बावजूद भी दोनों क रिश्ते में दरार आ गयी कारण राहुल का गरम स्वभाव और एहम(एगो). छोटी-छोटी बातों पर आग बबूला होना और हाथ तक उठा देना। भला गरिमा ही क्या कौन बर्दाश करेगा और भला कब तक। यहाँ एक बात महसूस करने की है की आजकल पुरुषों क साथ महिलाएं भी पड़ी लिखी हैं इसलिए उनमें भी आत्मसम्मान ज्यादा आ गया है क्योंकि वो भी आज अपने पैरों पर खड़ी हैं। बात अगर यंही तक रहती तो भी संभल सकती है पर जब इन्सान को लगने लगे की वो तो बिलकुल सही है और सामने वाला ही गलत है तो फिर वह सामने वाले को नीचा दिखने में भी कसर नहीं छोड़ता है।
इन्ही की तरह एक कहानी है भावना की जिसकी शादी तो हो गयी पर शादीशुदा जिंदगी का सुख देखने को तरस गयी। एकलौती बहु होने क बावजूद शादी के १० सालों में भी ससुराल को वो अपना घर नहीं कह पाई है कारण पुरानी मानसिकता से पीड़ित सास-ससुर, विवाहित नन्द का उसी घर में रहना और उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाला उसका पति सुनील। अछी नौकरी के बावजूद भावना रोज किसी न किसी बात पर ससुराल वालों के ताने सुन सुन कर थक चुकी है। सास ससुर चाहते हैं बहु नौकरी भी करे घर में पैसे लाये और घर क कामों में भी बिलकुल परफेक्ट हो वेगेरह-वेगेरह। भावना को हमेशा यही दुःख रहता की वो चाहे उन्हें कितना भी खुश कर ले पर उसे कभी वो प्यार और जगह नहीं मिल सकती जो उसी घर में नन्द ने ले रखी है क्योंकि उसके सास-ससुर को बेटी के प्यार में अपनी बहु की सिर्फ कमियां ही कमियां नज़र आती थी। जिन्हें वो समय-समय पर बहु को बोल बोल कर पूरा कर देते थे। रोज रोज के ताने और गली-गलोच सुन सुन कर भावना की भी हिम्मत टूट चुकी थी, क्योंकि शुरुआत में जब वो सुनील को यह बताती तो सुनील अपने माता-पिता का ही साथ देता था।